उर्दू शायरी · ग़ज़ल

yunhi ban jata hai hamdam raaz-e-junun afsana bhi

यूँही बन जाता है हमदम राज़-ए-जुनूँ अफ़्साना भी

یوں ہی بن جاتا ہے ہمدم راز جنوں افسانہ بھی

शायर: Jaleel Nomani Rampuri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

यूँही बन जाता है हमदम राज़-ए-जुनूँ अफ़्साना भी
दीवाने पर हँसता है जब अपना भी बेगाना भी

जानता है साक़ी भी वा'इज़ शाहिद है मय-ख़ाना भी
किस की ख़ातिर रेहन पड़ा है शीशा भी मय-ख़ाना भी

उन से जा कर कौन ये पूछे सादगी है या 'इश्वा-गरी
सामने आते शरमाते हैं जानते हैं दीवाना भी

एक इक ग़ुंचा चाक-गरेबाँ दस्त-बदामाँ इक इक गुल
जश्न-ए-बहाराँ में शामिल है अब के कोई दीवाना भी

बात है इस मंज़िल में साक़ी मयख़ाने में आया हूँ
वर्ना नज़र में मुद्दत से है का'बा भी बुत-ख़ाना भी

अहल-ए-महफ़िल ये क्या जानें कौन जला है किस के लिए
शम' भी महफ़िल में जलती है जलता है परवाना भी

ख़ुद है जुनूँ जब ‘अक्स-ए-तजल्ली कोई त'अय्युन कैसा 'जलील'
मिरी नज़र में दोनों हैं यकसाँ गुलशन भी वीराना भी