उर्दू शायरी · ग़ज़ल

musalsal tera gham uThane ke baad

मुसलसल तिरा ग़म उठाने के बा'द

مسلسل ترا غم اٹھانے کے بعد

शायर: Jaleel Nomani Rampuri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुसलसल तिरा ग़म उठाने के बा'द
हम इंसाँ बने इक ज़माने के बा'द

हँसी का तो क्या ज़िक्र कीजे कि हम
बहुत रोए हैं मुस्कुराने के बा'द

मैं अपनी ख़ताओं को देता हूँ दाद
वो क्या हो गए रूठ जाने के बा'द

वफ़ाओं का मुझ को सिला मिल गया
पशेमाँ हैं वो आज़माने के बा'द

ज़माने में दीवाने कहलाए हम
हुआ ये मोहब्बत छुपाने के बा'द

है क्यों इस क़दर रब्त-ए-बर्क़-ओ-बहार
ये समझा नशेमन बनाने के बा'द

इसी सोच में खो गया हूँ 'जलील'
कि भूला हूँ कुछ याद आने के बा'द