उर्दू शायरी · ग़ज़ल

thi magar ai gham-e-jaanan kabhi aisi to na thi

थी मगर ऐ ग़म-ए-जानाँ कभी ऐसी तो न थी

تھی مگر اے غم جاناں کبھی ایسی تو نہ تھی

शायर: Jaleel Nomani Rampuri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

थी मगर ऐ ग़म-ए-जानाँ कभी ऐसी तो न थी
ज़िंदगी ख़ुद से गुरेज़ाँ कभी ऐसी तो न थी

शिकवा-ए-जौर करूँ या तलब-ए-जौर करूँ
निगह-ए-नाज़ पशेमाँ कभी ऐसी तो न थी

यूँ तो सौ बार गुलिस्ताँ में बहार आती है
फ़िक्र-ए-दामान-ओ-गिरेबाँ कभी ऐसी तो न थी

देख आई है कहीं अबरू-ए-साक़ी पे शिकन
निगह-ए-गर्दिश-ए-दौराँ कभी ऐसी तो न थी

कुछ तो है बात कि हर बात पे रो देता है
तेरी हालत दिल-ए-नादाँ कभी ऐसी तो न थी

और भी बढ़ गया अफ़्सुर्दा-दिली का एहसास
आमद-ए-फ़स्ल-ए-बहाराँ कभी ऐसी तो न थी

किसी शाइस्ता-ए-वहशत से सबब पूछो 'जलील'
ज़ुल्फ़ उस रुख़ पे परेशाँ कभी ऐसी तो न थी