उर्दू शायरी · ग़ज़ल

yun na ho ab ki tera gham mujhe banjar kar de

यूँ न हो अब कि तिरा ग़म मुझे बंजर कर दे

یوں نہ ہو اب کہ ترا غم مجھے بنجر کر دے

शायर: Umood Abrar Ahmad5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

यूँ न हो अब कि तिरा ग़म मुझे बंजर कर दे
आज छू कर मुझे सहरा से समुंदर कर दे

तंग-ओ-तारीक ज़मानों में रहूँगी कब तक
चश्म-ए-बीना में जगह दे के मुनव्वर कर दे

कोई आसेब मिरे दिल में मकीं है कब से
ऐ ख़ुदा तू ही मिरे हाल को बेहतर कर दे

काश इस रात में ये आख़िरी उम्मीद मिरी
नक़्श बन बन के मिरी आँख को पत्थर कर दे

मेरी आँखों में समुंदर का चलन जारी हो
कुर्रा-ए-अर्ज़ का ग़म दे के सितमगर कर दे