उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bina manzil ke raston ka safar apna raha hai

बिना मंज़िल के रस्तों का सफ़र अपना रहा है

بنا منزل کے رستوں کا سفر اپنا رہا ہے

शायर: Umood Abrar Ahmad5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बिना मंज़िल के रस्तों का सफ़र अपना रहा है
मिरे दिल में वो यक-तरफ़ा मोहब्बत ला रहा है

नहीं ये जानता नादानियाँ अपनी हैं उस की
बड़ा बेचैन सा दिल है जो उस पर आ रहा है

नहीं रुकता है रोके से बड़ा मा'सूम दिल है
उसे अपना बनाने पर तुला ही जा रहा है

ग़म-ए-फ़ुर्क़त का अंदाज़ा लगा सकता नहीं वो
तग़ाफ़ुल में कई मौजों से जो टकरा रहा है

कि जब देखा ज़माने में 'अजब 'आलम ये देखा
जिसे देखा वो हसरत में मरा ही जा रहा है