उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye soch soch ke karte hain KHud-kushi patthar

ये सोच सोच के करते हैं ख़ुद-कुशी पत्थर

یہ سوچ سوچ کے کرتے ہیں خودکشی پتھر

शायर: Vijay kumar Swarnkar5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये सोच सोच के करते हैं ख़ुद-कुशी पत्थर
कि किस के फेर में आ कर हुई नदी पत्थर

नज़र-नवाज़ उजाले कहाँ उन आँखों में
जुड़े हुए हैं जहाँ दो नुमाइशी पत्थर

गुनाह क्या है सज़ा क्या है और क्या तौबा
जवाब सुन के न हो जाएँ आप भी पत्थर

दबी पड़ी हैं ग़रीबों की 'अर्ज़ियाँ कब से
कोई तो आए हटाए ये मतलबी पत्थर

सदी बदल गई फिर भी दिखाई देती है
इलाहाबाद के पथ पर वो तोड़ती पत्थर