उर्दू शायरी · ग़ज़ल

fitrat se uski aaj bhi wo kal nahin gaya

फ़ितरत से उस की आज भी वो कल नहीं गया

فطرت سے اس کی آج بھی وہ کل نہیں گیا

शायर: Vijay kumar Swarnkar4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

फ़ितरत से उस की आज भी वो कल नहीं गया
रस्सी तो जल गई है मगर बल नहीं गया

आपस की फूट कर गई बारिश को दाग़-दार
बैसाख में भी गाँव का दलदल नहीं गया

सूरत बदल भी जाए तो सीरत न जाए है
पत्थर नदी में गोल हुआ गल नहीं गया

बूढ़ों ने गाँव इस लिए छोड़ा नहीं कभी
चौपाल छोड़ कर कहीं पीपल नहीं गया