उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kohra hai ki dhundhla sa sapan oDh rakha hai

कोहरा है कि धुँधला सा सपन ओढ़ रखा है

کہرا ہے کہ دھندھلا سا سپن اوڑھ رکھا ہے

शायर: Vijay kumar Swarnkar6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कोहरा है कि धुँधला सा सपन ओढ़ रखा है
इस भोर ने क्या नंगे बदन ओढ़ रखा है

आ छत पे कि खींचें कोई अपने लिए कोना
आ सिर्फ़ सितारों ने गगन ओढ़ रखा है

क्या बात है क्यों धूप ने मुँह ढाँप लिया और
आकाश ने बरसा हुआ घन ओढ़ रखा है

धुन क्या है तुम्हें बूझ के लगता है कुछ ऐसा
जैसे किसी नग़्मे ने भजन ओढ़ रखा है

लाशों की है ये भीड़ ज़रा ग़ौर से देखो
ज़िंदा कई लोगों ने कफ़न ओढ़ रखा है

ऐ सर्द हवाओ इसे चादर न समझना
फ़ुटपाथ ने मुफ़्लिस का बदन ओढ़ रखा है