उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kaT chuka jangal magar zid par aDi hai

कट चुका जंगल मगर ज़िद पर अड़ी है

کٹ چکا جنگل مگر ضد پر اڑی ہے

शायर: Vijay kumar Swarnkar7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कट चुका जंगल मगर ज़िद पर अड़ी है
एक चिड़िया घोंसला ले कर खड़ी है

ऐसे उधड़ा है बदन सूखी नदी का
जैसे कोई लाश ला-वारिस पड़ी है

खो दिया सब ताप बादल से लिपट कर
धूप भी किस की मोहब्बत में पड़ी है

इस महल के सामने क्यों रुक गए तुम
सौ क़दम आगे वो अपनी झोंपड़ी है

याद रख हम एक छाते के तले हैं
भूल जा रिम-झिम है ऊपर या झड़ी है

बींध रक्खा था तुम्हारा चित्र जिस ने
कील वो दीवार में अब भी गड़ी है

आधी आबादी है भड़की हिम-नदी सी
अब किनारे डूब जाने की घड़ी है