उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye qalam mera jab se uThTha hai

ये क़लम मेरा जब से उठ्ठा है

یہ قلم میرا جب سے اٹھا ہے

शायर: Umood Abrar Ahmad5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये क़लम मेरा जब से उठ्ठा है
तुम को नज़रों का नूर लिक्खा है

और फिर बोलती नहीं हूँ मैं
मेरा इक-तरफ़ा 'इश्क़ सच्चा है

इक नज़र रोज़ वो दिखे हम को
मेरे दिल के लिए ये अच्छा है

कोई ऐसी महक लगी हरसू
'इश्क़ का ज़ौक़ जब से चक्खा है

हो के चुप-चाप सी मोहब्बत में
ख़ुद को ऐसे सँभाल रख्खा है