उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye dhoka ho na ho ummid hi malum hoti hai

ये धोका हो न हो उम्मीद ही मालूम होती है

یہ دھوکا ہو نہ ہو امید ہی معلوم ہوتی ہے

शायर: Kaifi Chirayyakoti9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये धोका हो न हो उम्मीद ही मालूम होती है
कि मुझ को दूर से कुछ रौशनी मालूम होती है

ख़ुदा जाने किस अंदाज़-ए-नज़र से तुम ने देखा है
कि मुझ को ज़िंदगी अब ज़िंदगी मालूम होती है

इसी का नाम शायद ज़िंदगी ने यास रखा है
नफ़स की जो खटक है आख़िरी मालूम होती

हुआ है हुस्न से कुछ और अक्स-ए-हुस्न-ए-ख़ुद्दारी
ख़मोशी उन के होंटों पर हँसी मालूम होती है

न आया हाथ मेरे बढ़ के जो दामन इनायत का
ये महरूमी तलब की कुछ कमी मालूम होती है

झुकाया आज दर पर ऐ ज़हे बख़्त-ए-सर-अफ़राज़ी
तिरी रहमत क़ुबूल-ए-बंदगी मालूम होती है

तुझे अपने लिए दस्त-ए-करम ये जानता हूँ मैं
कि तू है जिस क़दर दुनिया वही मालूम होती है

कहाँ हूँ किस तरफ़ हूँ मैं ख़बर इस की नहीं मुझ को
यही गुम-गश्तगी कुछ आगही मालूम होती है

सर-ए-मौज-ए-नफ़स कश्ती-ए-दिल को क्या कहूँ 'कैफ़ी'
उभरती है जहाँ तक डूबती मा'लूम होती है