उर्दू शायरी · ग़ज़ल

chaak sine ka ba-andaz-e-jigar ho ki na ho

चाक सीने का ब-अंदाज़-ए-जिगर हो कि न हो

چاک سینے کا بہ انداز جگر ہو کہ نہ ہو

शायर: Kaifi Chirayyakoti6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

चाक सीने का ब-अंदाज़-ए-जिगर हो कि न हो
और फिर लज़्ज़त-ए-जाँ ज़ौक़-ए-असर हो कि न हो

तुझ से ऐ शम्अ' सर-ए-शाम ही रुख़्सत हो लूँ
शब बसर हो कि न हो वक़्त-ए-सहर हो कि न हो

उम्र-ए-नज़्ज़ारा उसी जल्वे पे क़ुर्बां कर दूँ
फिर कभी और मुझे ताब-ए-नज़र हो कि न हो

अब जहाँ वो हैं मिरा होश वहीं है ऐ दिल
बे-ख़बर मैं हूँ उन्हें इस की ख़बर हो कि न हो

अपने महशर की सहर भेज ही दे अब यारब
या'नी तन्हा है मिरी रात बसर हो कि न हो

इस क़दर पूछ तो लो रू-ए-सहर से 'कैफ़ी'
उस पे रंग-ए-असर-ए-दीदा-ए-तर हो कि न हो