उर्दू शायरी · ग़ज़ल

go yaum-e-badr marka-e-kar-zar tha

गो यौम-ए-बद्र मा'रका-ए-कार-ज़ार था

گو یوم بدر معرکۂ کار زار تھا

शायर: Kaifi Chirayyakoti14 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

गो यौम-ए-बद्र मा'रका-ए-कार-ज़ार था
इस शक्ल में वो आयत-ए-परवरदिगार था

कहते हैं एक शख़्स असीरान-ए-बद्र से
रिश्ते में ख़्वेश-ए-सय्यद-ए-वाला-तबार था

वो कौन ज़ौज ज़ैनब-ए-बिन्त-ए-रसूल का
बुलआस वो जो साहिब-ए-इज़्ज़-ओ-वक़ार था

था हुक्म-ए-आम जो ज़र-ए-फ़िदया के वास्ते
दाख़िल हर एक इस में सिग़ार-ओ-किबार था

मक्के में ये ख़बर जो गई गूँजती हुई
छूटा अदा-ए-फ़िदया से जो माल-दार था

दामाद-ए-ताजदार-ए-मदीना असीर-ए-ग़म
अपने अदा-ए-फ़िद्या से बे-इख़्तियार था

ज़ैनब को दी ख़बर ये जनाब-ए-रसूल ने
फ़िदये का हुक्म-ए-ख़ास मगर बार बार था

जिस दम सुना ये हज़रत-ए-ज़ैनब ने माजरा
फ़िदया दिया वो अपने गले का जो हार था

लाया गया वो हार हुज़ूर-ए-रसूल में
देखा जो उस को आप का दिल बे-क़रार था

वो हार क्या था बाग़-ए-मोहब्बत का दाग़ था
या आतिश-ए-फ़िराक़ का ताज़ा शरार था

वो हार था कि हार की सूरत में जल्वा-गर
दाग़-ए-ग़म-ए-ख़दीजा-ए-उल्फ़त-शिआ'र था

भड़काई उस ने आतिश-ए-फ़ुर्क़त दबी हुई
या'नी ग़म-ए-फ़िराक़ की वो यादगार था

वो अक़्द या'नी शान-ए-मोहब्बत का ज़िंदा-दार
आज़ादी-ए-असीर का भी चारा-कार था

'कैफ़ी' यही वो जुरअत-ए-इख़्लास ख़ास थी
जिस से कि क़स्र-ए-दीन-ए-मुबीं उस्तुवार था