उर्दू शायरी · ग़ज़ल

yaqin hi ab yaqinon mein nahin hai

यक़ीं ही अब यक़ीनों में नहीं है

یقیں ہی اب یقینوں میں نہیں ہے

शायर: Balraj Bakhshi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

यक़ीं ही अब यक़ीनों में नहीं है
कोई सज्दा जबीनों में नहीं है

जो लम्हा फ़ैसले का ढूँढता हूँ
दिनों हफ़्तों महीनों में नहीं है

जुनूँ में पाँव ही आएँ तो आएँ
तहर्रुक कोई ज़ीनों में नहीं है

नज़र है होश है दिल भी है लेकिन
कोई भी रब्त तीनों में नहीं है

जिसे अफ़सोस भी हो और ख़ुशी भी
वही घर के मकीनों में नहीं है

हमारे लम्स की कारीगरी थी
नज़ाकत आबगीनों में नहीं है

हया-परवर अदाएँ क़ातिलाना
वफ़ा लेकिन हसीनों में नहीं है

अगर 'बलराज' ख़ुशबू बन के जाएँ
कोई सरहद ज़मीनों में नहीं है