उर्दू शायरी · ग़ज़ल

agar kabhi kisi surat se ji bahal jata

अगर कभी किसी सूरत से जी बहल जाता

اگر کبھی کسی صورت سے جی بہل جاتا

शायर: Balraj Bakhshi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अगर कभी किसी सूरत से जी बहल जाता
रुका पड़ा कोई आँसू हूँ मैं निकल जाता

बिछड़ना अपना मुक़द्दर अज़ल से है लेकिन
ये सानिहा किसी अगली घड़ी को टल जाता

क़दम ज़रा से किसी और सम्त उठ जाते
हमेशा के लिए घर का पता बदल जाता

उसे जो मेरी ज़रूरत अगर रही होती
किसी भी शक्ल में वो चाहता मैं ढल जाता

तुम्हारे आने से सहरा में फूल तो खिलते
मिरे मिज़ाज का मौसम भी कुछ बदल जाता

क़दम क़दम पे सहारे का हो गया मुहताज
अगर न थामता कोई तो मैं सँभल जाता

सदा-ए-ख़ैर न 'बलराज' रोक लेती अगर
बिला निशाना अंधेरे में तीर चल जाता