उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kabhi hansate rahe aur kabhi rulate rahe

कभी हँसाते रहे और कभी रुलाते रहे

کبھی ہنساتے رہے اور کبھی رلاتے رہے

शायर: Balraj Bakhshi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कभी हँसाते रहे और कभी रुलाते रहे
हमारे दोस्त हमें यूँ भी आज़माते रहे

मैं झेलता ही रहा जिन को दर्द की सूरत
वो एक फ़र्ज़ समझ कर मुझे निभाते रहे

जो लौट आए न देखा उन्हों ने मुड़ कर भी
जो डूबे हाथ वही देर तक हिलाते रहे

उन्हें कभी न हुआ फ़ासलों का अंदाज़ा
हर एक सम्त-ए-मुख़ालिफ़ से वो बुलाते रहे

तमाम 'उम्र यही मसअला रहा दरपेश
वो याद आते रहे और हम भुलाते रहे

कहाँ की क़ैद कहाँ की हुई नज़र-बंदी
हज़ार वसवसे हर वक़्त आते जाते रहे

इसी लिए तो अंधेरे ख़फ़ा रहे हम से
कि रौशनी के लिए दिल भी हम जलाते रहे

बदल के शक्ल हर इक लम्हा हर घड़ी 'बलराज'
हमारे साए हमें ही 'अबस डराते रहे