उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek haalat jo tazabzub ki bani rahti hai

एक हालत जो तज़ब्ज़ुब की बनी रहती है

ایک حالت جو تذبذب کی بنی رہتی ہے

शायर: Balraj Bakhshi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

एक हालत जो तज़ब्ज़ुब की बनी रहती है
अपने साए से भी हर वक़्त ठनी रहती है

अब तो जो बोलता हूँ पहले ही लिख लेता हूँ
कोई तलवार मिरे सर पे तनी रहती है

मुतमइन हूँ मैं किसी ज़ख़्मी परिंदे की तरह
जागते सोते दिल-ओ-जाँ पे बनी रहती है

इस लिए जलता बदन ले के चला आता हूँ
तिरी पलकों के तले छाओं घनी रहती है

इंतिज़ार उस का ख़याल उस का तमन्ना उस की
जो ख़यालों में कहीं गुल-बदनी रहती है

अब यक़ीनी है नज़रिये का तहफ़्फ़ुज़ यारो
सर पे तलवार तो गर्दन पे अनी रहती है

बारहा छूट गया दामन-ए-शीरीं 'बलराज'
मिरी तक़दीर में बस तेशा-ज़नी रहती है