उर्दू शायरी · ग़ज़ल

yaqin-e-nur ho dil mein to shab gawara hai

यक़ीन-ए-नूर हो दिल में तो शब गवारा है

یقین نور ہو دل میں تو شب گوارا ہے

शायर: Zaheer Ahmad6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

यक़ीन-ए-नूर हो दिल में तो शब गवारा है
सहर ने रात के उस पार से पुकारा है

न खाओ ख़ौफ़ तिलिस्मात-ए-मंज़र-ए-शब से
फ़रेब-ए-शो'ला-ए-ज़ुल्मत है जो नज़ारा है

बँधा हुआ है निगाहों से मेहर-ए-ताबाँ तक
चले चलो कि ये तार-ए-नज़र सहारा है

अभी से शिकवा-ए-अय्याम-ए-रफ़्ता चे-मा'नी
अभी तो रात हमारी है दिन हमारा है

धड़क भी जाए तो चिंगारियाँ सी उठती हैं
ये दिल नहीं मिरे सीने में संग-ए-ख़ारा है

हुजूम-ए-कार-ए-मुसलसल ने कर दिया तन्हा
मिरी कमाई मुनाफ़ा' नहीं ख़सारा है