उर्दू शायरी · ग़ज़ल

be-gharaz karte raho kaam mohabbat wale

बे-ग़रज़ करते रहो काम मोहब्बत वाले

بے غرض کرتے رہو کام محبت والے

शायर: Zaheer Ahmad7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बे-ग़रज़ करते रहो काम मोहब्बत वाले
ख़ुद मोहब्बत का हैं इन'आम मोहब्बत वाले

लफ़्ज़ फूलों की तरह चुन कर उसे दान करो
उस पे जचते हैं सभी नाम मोहब्बत वाले

शर्मगीं नज़रें तबस्सुम या छलकते आँसू
बे-सदा होते हैं पैग़ाम मोहब्बत वाले

ख़ुद को बेचा तो नहीं मैं ने मगर सोचूँगा
वो लगाए तो सही दाम मोहब्बत वाले

दिल की चौपाल में महफ़िल सी जमी रहती है
मिलने आते हैं सर-ए-शाम मोहब्बत वाले

ग़म किसी का भी हो देते हैं जगह पहलू में
दिल बड़ा रखते हैं नाकाम मोहब्बत वाले

लोग अंदर से ये होते हैं बड़े ‘आली-शान
वैसे लगते हैं बहुत 'आम मोहब्बत वाले