उर्दू शायरी · ग़ज़ल

apne har dard ka darman banae rakkha

अपने हर दर्द का दरमान बनाए रक्खा

اپنے ہر درد کا درمان بنائے رکھا

शायर: Zaheer Ahmad7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अपने हर दर्द का दरमान बनाए रक्खा
ग़म इक ऐसा था कि सीने से लगाए रक्खा

पास-ए-नामूस-ए-मसीहा था मुझे दर-पर्दा
ज़ख़्म-ए-जाँ-सोज़ को मरहम से बचाए रक्खा

एक अंदेशा-ए-ना-क़द्री-ए-'आलम ने मुझे
'उम्र भर चश्म-ए-ज़माना से छुपाए रक्खा

कभी जाने न दिया घर का अंधेरा बाहर
इक दिया मैं ने दरीचे में जलाए रक्खा

देख कर बरहना-पा राह के काँटों ने मुझे
रश्क-ए-गुलशन मिरे रस्ते को बनाए रक्खा

अस्ल किरदार तमाशे के वही लोग तो थे
वक़्त ने जिन को तमाशाई बनाए रक्खा

देख सकता था बहुत दूर तक आगे मैं 'ज़हीर'
जब तक इन शानों पे बच्चों को उठाए रक्खा