उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aatish-e-ranj-o-alam sail-e-bala samne hai

आतिश-ए-रंज-ओ-अलम सैल-ए-बला सामने है

آتش رنج و الم سیل بلا سامنے ہے

शायर: Zaheer Ahmad10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आतिश-ए-रंज-ओ-अलम सैल-ए-बला सामने है
पैकर-ए-ख़ाक में होने की सज़ा सामने है

शो'ला-ए-जाँ है मिरा और हवा सामने है
ज़िंदगी जल्वा-नुमा है कि क़ज़ा सामने है

हर तरफ़ ढूँडने वालो इसे देखो तो सही
वो कहीं और नहीं है ब-ख़ुदा सामने है

मुन'अकिस हूँ मैं ज़माने में ज़माना मुझ में
ख़ुद भी आईना हूँ और ‘अक्स-नुमा सामने है

लग़्ज़िश-ए-पा-ए-तमन्ना का भी इम्कान नहीं
जादा-ए-शौक़ में गर उस की रज़ा सामने है

क्या ख़बर कौन सा जल्वा है पस-ए-पर्दा-ए-ग़ैब
जिस तरफ़ देखिए इक राज़ नया सामने है

फिर वही सोज़-ए-दरूँ मेरा वही ग़फ़लत-ए-जाँ
फिर वही सा'अत-ए-तज्दीद-ए-वफ़ा सामने है

मुझे नामूस-ए-ग़म-ए-'इश्क़ है माने' वर्ना
चारागर बैठे हैं पहलू में दवा सामने है

अपने बारे में न खा 'इस्मत-ए-यूसुफ़ की क़सम
पहले ये देख तो ले चाक-ए-क़बा सामने है

हम भला कौन से सुक़रात-ए-ज़माँ हैं जो 'ज़हीर'
रोज़ इक ज़हर भरा जाम नया सामने है