उर्दू शायरी · ग़ज़ल

yar sahraon ki aankhon mein samundar bhi na tha

यार सहराओं की आँखों में समुंदर भी न था

یار صحراؤں کی آنکھوں میں سمندر بھی نہ تھا

शायर: Umar Farhat5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

यार सहराओं की आँखों में समुंदर भी न था
सामने घर के मिरे और कोई घर भी न था

किस तरह तुझ से भला मिलने की सूरत बनती
मेरी क़िस्मत में तिरे वस्ल का ज़ेवर भी न था

किस तरह उड़ने की उम्मीद पनप सकती थी
आसमानों पे मोहब्बत का कोई पर भी न था

मैं पिघल जाता मोहब्बत के हसीं शो'ले से
पर मिरे सामने वो मोम का पैकर भी न था

दहर में अब मैं भला किस की नुमाइश करता
अब वो बाहर है कहाँ जो मिरे अंदर भी न था