उर्दू शायरी · ग़ज़ल

agarche raat zalim din kaDa hai

अगरचे रात ज़ालिम दिन कड़ा है

اگرچہ رات ظالم دن کڑا ہے

शायर: Umar Farhat5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अगरचे रात ज़ालिम दिन कड़ा है
ज़माने से हमारा ग़म बड़ा है

हमारी बात तक सुनता नहीं वो
ये कैसे शख़्स से पाला पड़ा है

पनपता ही नहीं है कुछ भी मुझ में
मिरे दिल में कोई मुर्दा गड़ा है

हवाओं में उदासी भर गया है
ये कैसा शाख़ से पत्ता झड़ा है

'उमर-फ़रहत’ है बस हम को उठाना
ये दुनिया है यहाँ क्या क्या पड़ा है