उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek tamasha faqat dikha raha hun

इक तमाशा फ़क़त दिखा रहा हूँ

اک تماشا فقط دکھا رہا ہوں

शायर: Umar Farhat6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इक तमाशा फ़क़त दिखा रहा हूँ
आ रहा हूँ कहीं न जा रहा हूँ

जीत सकता था मैं अना की जंग
हार का ज़हर ख़ुद ही खा रहा हूँ

मुझ को देखो न यूँ हिक़ारत से
मैं भी कुछ देर ना-ख़ुदा रहा हूँ

अपने इन आँसुओं की शिद्दत से
सारी दुनिया को मैं हँसा रहा हूँ

दरमियाँ जो पड़ा है पर्दा अब
सामने से उसे हटा रहा हूँ

जिस से बनती नहीं ''उमर-फ़रहत'
उसे अपना कहाँ बना रहा हूँ