उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dhup nayab hui jati hai

धूप नायाब हुई जाती है

دھوپ نایاب ہوئی جاتی ہے

शायर: Umar Farhat5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

धूप नायाब हुई जाती है
छाँव बे-ताब हुई जाती है

पानी दरिया में नहीं है लेकिन
बस्ती ग़र्क़ाब हुई जाती है

गिर गई ओस बदन पर कैसी
रूह सैराब हुई जाती है

मैं किसी रात का सन्नाटा हूँ
वो कोई ख़्वाब हुई जाती है

बर्फ़ क्या दूर गिरी है 'फ़रहत'
नद्दी पायाब हुई जाती है