उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wus’at-e-zat ko nuqta kar lun

वुस'अत-ए-ज़ात को नुक़्ता कर लूँ

وسعت ذات کو نقطہ کر لوں

शायर: Vikas Sharma Raaz5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वुस'अत-ए-ज़ात को नुक़्ता कर लूँ
इक नई शक्ल का जादा कर लूँ

मेरे होने से कोई है वर्ना
अपने होने से मैं तौबा कर लूँ

उस के लहजे में पुकारूँ ख़ुद को
ख़ुद को कुछ और अकेला कर लूँ

रंग मिट्टी से नुमू होते हैं
मौसमो क्या मैं भरोसा कर लूँ

धूप बरसा रही है ख़ामोशी
यूँ करूँ लफ़्ज़ को साया कर लूँ