उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wo tere iltifat ka mausam guzar gaya

वो तेरे इल्तिफ़ात का मौसम गुज़र गया

وہ تیرے التفات کا موسم گزر گیا

शायर: Ghani Ahmad Ghani8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वो तेरे इल्तिफ़ात का मौसम गुज़र गया
अच्छा हुआ ये बोझ भी सर से उतर गया

था मुनहसिर ख़राबी-ए-दिल पर सुकून-ए-ज़ीस्त
बिगड़े हम इस तरह कि ज़माना सँवर गया

अब चश्म-ए-आरज़ू में कोई दास्ताँ नहीं
अफ़्साना-ए-हयात कोई ख़त्म कर गया

जैसे नसीम छू के गुज़र जाए कोई फूल
तेरा ख़याल यूँ मिरे दिल से गुज़र गया

ऐ ख़ून-ए-आरज़ू तिरा एहसान क्या कहूँ
तू किश्त-ए-आरज़ू मिरी शादाब कर गया

बज़्म-ए-वफ़ा में वो हमा-तन-गोश थे मगर
होंटों तक आ के हर्फ़-ए-तमन्ना किधर गया

उम्र-ए-बहार और 'ग़नी' इतनी मुख़्तसर
झपकी जो आँख क़ाफ़िला-ए-दिल गुज़र गया

क्या पूछते हो तुम ख़लिश-ए-दिल का माजरा
दामान-ए-आरज़ू कोई काँटों से भर गया