उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ab to wo bhi mujhko talqin-e-shakebai kare

अब तो वो भी मुझ को तल्क़ीन-ए-शकेबाई करे

اب تو وہ بھی مجھ کو تلقین شکیبائی کرے

शायर: Ghani Ahmad Ghani6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अब तो वो भी मुझ को तल्क़ीन-ए-शकेबाई करे
कोई किस से शिकवा-ए-आशोब-ए-तन्हाई करे

गुफ़्तुगू सब से ब-अंदाज़-ए-पज़ीराई करे
और सौ सौ तरह मुझ से हीला-आराई करे

क्या करे वो भी कि दस्तूर-ए-ज़माना है यही
बे-रुख़ी अपनों से ग़ैरों से शनासाई करे

क्यों हमारी चारा-जूई के लिए आए कोई
किस को फ़ुर्सत है कि तकलीफ़-ए-मसीहाई करे

फिर उसी कू-ए-मलामत की तमन्ना दिल में है
आए अब कोई हमारी हिम्मत-अफ़्ज़ाई करे

क्या मिला फ़नकार को संग-ए-मलामत के सिवा
क्यों लहू दिल का जलाए ख़ामा-फ़रसाई करे