उर्दू शायरी · ग़ज़ल

apne mazi ki tarah ab bhi daraKHshanda hun

अपने माज़ी की तरह अब भी दरख़्शंदा हूँ

اپنے ماضی کی طرح اب بھی درخشندہ ہوں

शायर: Ghani Ahmad Ghani9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अपने माज़ी की तरह अब भी दरख़्शंदा हूँ
नाज़िश-ए-हाल हूँ सूरत-गर-ए-आइंदा हूँ

मार ही डाला था अफ़्कार-ए-जहाँ ने मुझ को
ये मिरी ज़िंदा-दिली है कि अभी ज़िंदा हूँ

तू पशेमाँ है उधर अपनी सितम-कोशी पर
मैं इधर शिकवा-ए-बेदाद पे शर्मिंदा हूँ

सारे आलम में है मीनारा-ए-नूर अपना वजूद
मैं अँधेरों में उजालों का नुमाइंदा हूँ

नज़्र-ए-आलाम सही ख़ाक-बर-अंदाम सही
मैं सितारों की तरह फिर भी दरख़्शंदा हूँ

माया-ए-नाज़ है मुझ को ये तवानाई-ए-फ़िक्र
है यही बात कि मैं ज़िंदा-ओ-पाइंदा हूँ

यही निस्बत है बहुत मेरे तआ'रुफ़ के लिए
मैं तिरा चाहने वाला तिरा जोइंदा हूँ

अपने ही शहर में खोली थी 'फ़ज़ा' ने आँखें
फ़ख़्र है मुझ को उसी शहर का बाशिंदा हूँ

उम्र सारी मिरी ख़तरात में गुज़री है 'ग़नी'
आज भी मैं उन्हीं हालात में हूँ ज़िंदा हूँ