उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wo qarya-e-mahtab rahe subh-o-masa yaad

वो क़र्या-ए-महताब रहे सुब्ह-ओ-मसा याद

وہ قریۂ مہتاب رہے صبح و مسا یاد

शायर: Hafiz Ludhiyanvi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वो क़र्या-ए-महताब रहे सुब्ह-ओ-मसा याद
कुछ भी न रहे शहर-ए-तमन्ना के सिवा याद

अनवार की बारिश थी सर-ए-मंज़िल-ए-तैबा
हर मंज़िल-ए-ख़ुश देख के आता था ख़ुदा याद

अब तक हैं निगाहों में दर-ओ-बाम हरम के
अब तक है मुझे वादी-ए-रहमत की फ़ज़ा याद

है सीरत-ए-अतहर मिरा सर्माया-ए-हस्ती
महबूब-ए-दो-आलम की है एक एक अदा याद

डूबे न कभी मेरे मुक़द्दर का सितारा
इक बार जो कर लें मुझे महबूब-ए-ख़ुदा याद

क़ुर्बान हुई जाती थीं रहमत की घटाएँ
इन काँपते होंटों का है अंदाज़-ए-दुआ याद

हर एक के दामन में मुरादों के गुहर थे
'हाफ़िज़' मुझे दरबार की है शान-ए-सख़ा याद