उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jo KHush-nasib huzuri mein ja nikalta hai

जो ख़ुश-नसीब हुज़ूरी में जा निकलता है

جو خوش نصیب حضوری میں جا نکلتا ہے

शायर: Hafiz Ludhiyanvi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जो ख़ुश-नसीब हुज़ूरी में जा निकलता है
लबों से नग़्मा-ए-सल्ल-ए-अला निकलता है

मोहब्बतों का अजब शहर है मदीना भी
हर एक शख़्स जहाँ आश्ना निकलता है

निगाह-ए-शौक़ को मिलता है इज़्न-ए-गोयाई
ख़मोशियों में भी इक मुद्दआ' निकलता है

अजब मुरक़्क़ा-ए-दिलकश है याद-ए-शहर-ए-नबी
हज़ार रंग जहाँ ना'त का निकलता है

बिखेर देता है क़िर्तास पर गुहर-पारे
क़लम से जब मिरे हर्फ़-ए-सना निकलता है

जनाब-ए-रहमत-ए-आलम का फ़ैज़ है 'हाफ़िज़'
हर एक शे'र से मज़मूँ नया निकलता है