उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wo jis ka Dar tha ki hoga guzishta sham hua

वो जिस का डर था कि होगा गुज़िश्ता शाम हुआ

وہ جس کا ڈر تھا کہ ہوگا گذشتہ شام ہوا

शायर: Umair Najmi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वो जिस का डर था कि होगा गुज़िश्ता शाम हुआ
अचानक एक त'अल्लुक़ का इख़्तिताम हुआ

उदासी ओढ़ना हम ने सिखाया दुनिया को
हमारी वज्ह से काला लिबास 'आम हुआ

उस आदमी से मिले थे जो दर्द बाँटता है
हमारा नाम लिया था तुम्हारा काम हुआ

ग़रीब बाप का तरका था हसरतों का ख़ला
जो दो तिहाई विरासत में मेरे नाम हुआ

वो एक शख़्स ग़ुलामी को कर गया मम्नून
फिर इक ज़माना उसी शख़्स का ग़ुलाम हुआ

पता चला कि कई मुस्तक़िल मुक़ीम भी हैं
जब उस के दिल में मिरा 'आरज़ी क़याम हुआ

मरीज़ बच न सका ख़ैर जो ख़ुदा की रज़ा
वो अस्पताल के ख़र्चे का इंतिज़ाम हुआ

किसी से जुड़ के किसी का ग़ुरूर तोड़ा 'उमैर'
ख़ुदा को शिर्क दिखाया तो जा के राम हुआ