उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wo bazahir kabhi ayan na hua

वो बज़ाहिर कभी 'अयाँ न हुआ

وہ بظاہر کبھی عیاں نہ ہوا

शायर: Qadr Oraizi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वो बज़ाहिर कभी 'अयाँ न हुआ
फिर भी मुश्ताक़ से निहाँ न हुआ

आज क्यों मेरा इम्तिहाँ न हुआ
बर्क़ की नज़्र आशियाँ न हुआ

न हुआ मुझ पे मेहरबाँ कोई
जब तक अल्लाह मेहरबाँ न हुआ

सिर्फ़ रुस्वाई के लिए मेरी
ज़िक्र मेरा कहाँ कहाँ न हुआ

हर दम आफ़त में जाँ है इस के लिए
ग़म हुआ ये तो आशियाँ न हुआ

दिल की ख़ातिर हज़ार कोशिश की
वो न होना था मेहरबाँ न हुआ

कोई महबूब अपने तालिब का
'क़द्र' अब तक तो क़द्र-दाँ न हुआ