उर्दू शायरी · ग़ज़ल

is pe dhabba na laga nam ko ruswai ka

इस पे धब्बा न लगा नाम को रुस्वाई का

اس پہ دھبہ نہ لگا نام کو رسوائی کا

शायर: Qadr Oraizi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इस पे धब्बा न लगा नाम को रुस्वाई का
आज तक पाक है दामन मिरी बीनाई का

याद है किस को सबब उस की शनासाई का
वो भी इक होगा करिश्मा इसी बीनाई का

गर्मी-ए-ज़ौक़-ए-नज़ारा से नहीं अश्क रवाँ
अस्ल में है ये पसीना मिरी बीनाई का

ठोकरों से मिरी नज़रों को इलाही तू बचा
अब क़दम बढ़ने लगा है मिरी बीनाई का

होंगे तय बा'द तक़र्रुब के मराहिल सारे
देख लेना ही बड़ा काम है बीनाई का

इस में हर वक़्त भरी रहती है नज़रों की शराब
आँख पैमाना है मय-ख़ाना-ए-बीनाई का

आ गई चश्म-ए-करम हज़रत-ए-ज़ीरक की जो याद
'क़द्र' ने क़ैद किया क़ाफ़िया बीनाई का