उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dast-e-junun ne mujhko pareshan bana diya

दस्त-ए-जुनूँ ने मुझ को परेशाँ बना दिया

دست جنوں نے مجھ کو پریشاں بنا دیا

शायर: Qadr Oraizi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दस्त-ए-जुनूँ ने मुझ को परेशाँ बना दिया
जो चीज़ हाथ आई गरेबाँ बना दिया

आख़िर मिरे जुनून-ए-सलीक़ा-शि'आर ने
काँटे को फूल गुल को गुलिस्ताँ बना दिया

ऐ हुस्न-ए-ला-यज़ाल ये अफ़ज़ाल थे तिरे
जो ज़ौक़-ए-‘इश्क़ ने मुझे इंसाँ बना दिया

तू ऐ ख़याल-ए-गुल सद-ओ-सी-साल ज़िंदाबाद
तू ने मिरे क़फ़स को गुलिस्ताँ बना दिया

हुस्न-ए-तजल्लियात ने अंदाज़-ए-ख़ास से
आईना-ए-ख़याल को हैराँ बना दिया

खींचे वो बेल-बूटे उतारे वो फूल फल
दामन को अश्क-ए-ख़ूँ ने गुलिस्ताँ बना दिया

दिल को हमारे वहशत-ए-'आशिक़-नवाज़ ने
सरमाया-ए-ख़याल-ए-परेशाँ बना दिया

फूले फले निहाल-ए-हयात उस का ऐ ख़ुदा
जिस ने मिरी लहद को गुलिस्ताँ बना दिया

आ आ के 'क़द्र' ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ की याद ने
अपने करम से मुझ को परेशाँ बना दिया