उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jo chashm-e-shauq ki haalat se aashkar na tha

जो चश्म-ए-शौक़ की हालत से आश्कार न था

جو چشم شوق کی حالت سے آشکار نہ تھا

शायर: Qadr Oraizi14 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जो चश्म-ए-शौक़ की हालत से आश्कार न था
वो इंतिज़ार ब-'उनवान-ए-इंतिज़ार न था

ये और क्या था किसी का जो इंतिज़ार न था
नज़र को चैन न था क़ल्ब को क़रार न था

‘उरूज-ए-इश्क़ में थीं बद-गुमानियाँ ऐसी
किसी का ज़िक्र ही क्या अपना ए'तिबार न था

तिरे ख़याल की नैरंगियों का था ये असर
कभी क़रार था दिल को कभी क़रार न था

मुझे वहाँ के नज़ारे का हाल क्या मा'लूम
जहाँ निगाह उठाने का इख़्तियार न था

न आए वो मुझे था जिन का इंतिज़ार शदीद
क़यामत आई क़यामत का इंतिज़ार न था

क़रार उस की जुदाई में किस तरह आता
ख़याल जब किसी मरकज़ पे बरक़रार न था

जो ए'तिबार दिलाया था आप ने मुझ को
वो ए'तिबार का धोका था ए'तिबार न था

जब उस के सामने पहुँचा हूँ मैं नहीं मा'लूम
क़रार था मुझे उस वक़्त या क़रार न था

उड़ाए थे तिरे जल्वे ने जिस के होश-ओ-हवास
वो होशियार हुआ भी तो होशियार न था

जमाल-ए-यार का 'ऐन-उल-यक़ीन था लेकिन
मिरी नज़र का मिरे दिल को ए'तिबार न था

हमारे दिल का तलव्वुन अरे मआज़-अल्लाह
निज़ाम-ए-फ़िक्र बहर-हाल बरक़रार न था

वो किस मक़ाम पे था तेरा नक़्श-ए-पा ऐसा
जो मेरे सज्दा-ए-उल्फ़त की यादगार न था

मैं क्या बताऊँ उन्हें 'क़द्र' जो ये पूछते हैं
भर आईं किस लिए आँखें जो दिल पे बार न था