उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHamosh is tarah se na jal kar dhuan uTha

ख़ामोश इस तरह से न जल कर धुआँ उठा

خاموش اس طرح سے نہ جل کر دھواں اٹھا

शायर: Qadr Oraizi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

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ख़ामोश इस तरह से न जल कर धुआँ उठा
ऐ शम्अ' कुछ तो बोल कभी तो ज़बाँ उठा

बुत बन के चुपके फ़ित्ने न यूँ मेरी जाँ उठा
मुँह में अगर ज़बाँ है तो लुत्फ़-ए-ज़बाँ उठा

है कोसों दूर मंज़िल-ए-अंजाम-ए-गुफ़्तुगू
तेज़ी के साथ अपने क़दम ऐ ज़बाँ उठा

डर है यही कि कश्ती-ए-मज़मूँ न डूब जाए
रह रह के इतनी मौजें न बहर-ए-ज़बाँ उठा

अब दौर में है रिंदों के पैमाना-ए-कलाम
फिर आ गई बहार फिर अब्र-ए-ज़बाँ उठा

कर इस क़दर न ज़ौक़-ए-तकल्लुम को शर्मसार
अपना सर-ए-नियाज़ कभी तो ज़बाँ उठा

कहता है 'क़द्र' देख के तेरे सुकूत को
कुछ फ़ाएदा कलाम से भी ऐ ज़बाँ उठा