उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wo baaten ishq kahta tha ki sara ghar mahakta tha

वो बातें इश्क़ कहता था कि सारा घर महकता था

وہ باتیں عشق کہتا تھا کہ سارا گھر مہکتا تھا

शायर: Qamar Jameel7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वो बातें इश्क़ कहता था कि सारा घर महकता था
मिरा महबूब जैसे गुल था और बुलबुल चहकता था

सफ़र में शाम हो जाती तो दिल में शमएँ जल उठतीं
लहू में फूल खिल जाते जहाँ ग़ुंचा चटकता था

कभी मैं सर्व की सूरत नज़र आता था यारों को
कभी ग़ुंचे की सूरत अपने ही दिल में धड़कता था

ख़ुदा जाने मैं उस के साथ रहता था कि आईना
मिरे पर्दे में अपने-आप को हैरत से तकता था

ख़ुदा जाने वो कैसा आदमी था जिस के माथे पर
कोई बिंदिया लगाता था तो इक जुगनू चमकता था

कभी रहता था उस के साथ मैं उस के गरेबाँ में
कभी फ़ुर्क़त में अपने आइने पर सर पटकता था

अँधेरी रात जब सावन में आती थी तो इक बुलबुल
ख़ुदा जाने कहाँ से आ के मेरे घर चहकता था