उर्दू शायरी · ग़ज़ल

pas-e-ghubar aai thi sada mujhe

पस-ए-ग़ुबार आई थी सदा मुझे

پس غبار آئی تھی صدا مجھے

शायर: Vikas Sharma Raaz7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

पस-ए-ग़ुबार आई थी सदा मुझे
फिर उस के बा'द कुछ नहीं दिखा मुझे

मैं ख़ामुशी से अपनी सम्त बढ़ गया
तिरा फ़िराक़ देखता रहा मुझे

मुक़ाबला किया ज़रा सी देर बस
फिर उस के बा'द शेर खा गया मुझे

ये और बात रात कट गई मगर
तिरे बग़ैर डर बहुत लगा मुझे

वो एक शाम राएगाँ चली गई
उस एक शाम कितना काम था मुझे

मगर मैं पहले की तरह न बन सका
उधेड़ कर जो फिर बुना गया मुझे

कुछ और ही था रंग रात शह्र का
सहर हुई तो मुख़्तलिफ़ लगा मुझे