उर्दू शायरी · ग़ज़ल

barg-rezon se rifaqat hai meri

बर्ग-रेज़ों से रिफ़ाक़त है मिरी

برگ ریزوں سے رفاقت ہے مری

शायर: Vikas Sharma Raaz6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बर्ग-रेज़ों से रिफ़ाक़त है मिरी
कितनी आसान वज़ाहत है मिरी

क्या वही घर जहाँ लिक्खा है 'इश्क़
क्या उसी घर में सुकूनत है मिरी

हर्फ़ था और सुख़न तक पहुँचा
क़ाबिल-ए-रश्क मसाफ़त है मिरी

दश्त-ज़ादों को नहीं भाती है
कुछ अलग तरह की वहशत है मिरी

एक तुम ही नहीं 'आरी मुझ से
इन दिनों मुझ को भी क़िल्लत है मिरी

अब के वो रंज बहुत दुख देगा
अब के जिस रंज में शिरकत है मिरी