उर्दू शायरी · ग़ज़ल

pahchante hain raste mujh KHaksar ko

पहचानते हैं रास्ते मुझ ख़ाकसार को

پہچانتے ہیں راستے مجھ خاکسار کو

शायर: Vikas Sharma Raaz6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

पहचानते हैं रास्ते मुझ ख़ाकसार को
मैं साथ ले के चलता हूँ अपने ग़ुबार को

अपनी पसंद के रखे उस ने धनक में रंग
टोका नहीं किसी ने भी परवरदिगार को

पढ़ने लगा मैं कत्बे को और नींद खुल गई
देखा था जाने ख़्वाब में किस के मज़ार को

बिखरे हुए पड़े रहो अब अपनी ज़ात में
क्यों अन-सुना किया था लहू की पुकार को

अच्छी खपत है इन दिनों हिज्र-ओ-विसाल की
सो मैं ने भी बढ़ा दिया है कारोबार को

कब तक छुपे रहोगे किताबों की ओट में
तन्हाई ढूँढ लेती है अपने शिकार को