उर्दू शायरी · ग़ज़ल

fasil-e-shab pe taron ne likha kya

फ़सील-ए-शब पे तारों ने लिखा क्या

فصیل شب پہ تاروں نے لکھا کیا

शायर: Vikas Sharma Raaz8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

फ़सील-ए-शब पे तारों ने लिखा क्या
मैं महव-ए-ख़्वाब था तुम ने पढ़ा क्या

फ़ज़ा में घुल गए हैं रंग कितने
ज़रा सी धूप से बादल खुला क्या

हवाओं को उलझने से है मतलब
मिरी ज़ंजीर क्या तेरी रिदा क्या

बदन में क़ैद हो कर रह गई है
हमारी रूह का था मुद्द'आ क्या

शजर की बे-लिबासी पूछती है
हर इक पत्ता गिरा था बे-सदा क्या

जिसे भी देखिए वो नींद में है
हमारे शह्र को आख़िर हुआ क्या

चराग़ इक दूसरे से पूछते हैं
सभी हो जाएँगे रिज़्क़-ए-हवा क्या

अभी तो राख होना है बहुत कुछ
अभी से 'राज़' छाती पीटना क्या