उर्दू शायरी · ग़ज़ल

main apne aap se kalam kar raha tha

मैं अपने आप से कलाम कर रहा था

میں اپنے آپ سے کلام کر رہا تھا

शायर: Vikas Sharma Raaz7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मैं अपने आप से कलाम कर रहा था
चढ़ा हुआ था जो नशा उतर रहा था

तमाम काएनात एक नुक़्ते में थी
मैं वज्द में था और रक़्स कर रहा था

क़दीम आसमान हँस रहा था मुझ पे
नई ज़मीन पर मैं पाँव धर रहा था

'अजीब सी उथल-पुथल मची थी मुझ में
दरख़्त सब्ज़े को विदा' कर रहा था

दरून-ए-ज़ात रौशनी सिमट रही थी
दरून-ए-ज़ात एक ज़ख़्म भर रहा था

शिकस्ता नाव हैरतों से भर गई थी
भँवर के दरमियाँ भँवर उभर रहा था

तमाम मरहले मिरे लिए नए थे
मैं पहली बार आग से गुज़र रहा था