उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye jo ab zat se kam-suKHani hai

ये जो अब ज़ात से कम-सुख़नी है

یہ جو اب ذات سے کم سخنی ہے

शायर: Vikas Sharma Raaz6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये जो अब ज़ात से कम-सुख़नी है
ये भी इक तरह की महरूमी है

मंज़िलों से उसे भी है वहशत
अब के जिस शख़्स से हम-सफ़री है

पहले तन्हाई का था ज़ो'म मुझे
अब मिरे पास उदासी भी है

जब कोई बोझ नहीं शाने पर
क्यों मुझे फ़िक्र-ए-सुबुकदोशी है

रम्ज़ उस धुंध का मैं जान गया
लोग कहते रहे ये ग़ैबी है

जिस से रौशन है ये सूखा सब्ज़ा
जुस्तुजू मुझ को उसी रंग की है