उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ghuTan baDhti gai mujh mein

घुटन बढ़ती गई मुझ में

گھٹن بڑھتی گئی مجھ میں

शायर: Vikas Sharma Raaz7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

घुटन बढ़ती गई मुझ में
फिर इक खिड़की खुली मुझ में

हुआ आबाद आख़िर-कार
उदासी बस गई मुझ में

मिरी मिट्टी ही ऐसी है
कि रहती है नमी मुझ में

वो इक शफ़्फ़ाफ़ दिन था जब
बिना-ए-शब पड़ी मुझ में

लहू का रक़्स सुनता हूँ
है इतनी ख़ामुशी मुझ में

ये अब जो राख बिखरी है
कभी क्या आग थी मुझ में

वो जिस में कुछ नहीं उगता
वो रुत आ ही गई मुझ में