उर्दू शायरी · ग़ज़ल

waqt ki had se nikalta ja raha hai

वक़्त की हद से निकलता जा रहा है

وقت کی حد سے نکلتا جا رہا ہے

शायर: Raees Manzar6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वक़्त की हद से निकलता जा रहा है
इक मुसाफ़िर हाथ मलता जा रहा है

आह मज़लूमों की बार-आवर हुई है
'इल्म का पत्थर पिघलता जा रहा है

शहर की तहज़ीब हमले कर रही है
गाँव का नक़्शा बदलता जा रहा है

आसमाँ पर हैं कमंदें और ज़मीं पर
एक गहरा दर्द पलता जा रहा है

क्या कहूँ उस आदमी की बे-हिसी को
बर्ग-ए-गुल को जो मसलता जा रहा है

घर बसा कर जो अभी बैठा है 'मंज़र'
इक नए साँचे में ढलता जा रहा है