उर्दू शायरी · ग़ज़ल

haqiqaton ko meri dastan banate hue

हक़ीक़तों को मिरी दास्ताँ बनाते हुए

حقیقتوں کو مری داستاں بناتے ہوئے

शायर: Raees Manzar7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हक़ीक़तों को मिरी दास्ताँ बनाते हुए
हवाएँ डरने लगी हैं मुझे बुझाते हुए

कहाँ से आए थे और किस तरफ़ चले गए वो
मिरे सफ़र में मुझे आइना दिखाते हुए

वो चाहते तो हवाओं का रुख़ बदल देते
जो देखते रहे शम'ओं को झिलमिलाते हुए

मुझे पता है वो अंदर से कितने ज़ख़्मी हैं
जो मेरे सामने आते हैं मुस्कुराते हुए

उछालते थे अँधेरों को जो मिरी जानिब
मुझे न देख सके रौशनी में आते हुए

ख़ुद अपना वक़्त गँवाने की याद आई बहुत
जो अपने बच्चों को देखा पतंग उड़ाते हुए

समझ रहा था उन्हीं को मैं रूनुमा 'मंज़र'
जो पल रहे थे मिरी मुश्किलें बढ़ाते हुए