उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ghalat nahin tha agar qahqahon ki zad par tha

ग़लत नहीं था अगर क़हक़हों की ज़द पर था

غلط نہیں تھا اگر قہقہوں کی زد پر تھا

शायर: Raees Manzar7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ग़लत नहीं था अगर क़हक़हों की ज़द पर था
कि शहर-ए-संग में इक मैं ही आइना-गर था

हर एक शख़्स था अपने बचाओ में मसरूफ़
सवाल उठाने का मौक़ा' किसे मयस्सर था

सुबुक न होने दिया अपने रू-ब-रू उस ने
वो आदमी जो बहर-हाल मुझ से बरतर था

वो ख़ुद-फ़रेब कोई और कब था मेरे सिवा
जो ख़ुद को आइना कहता था और पत्थर था

मिरी निगाह से मख़्फ़ी न था कोई किरदार
कि दास्तान का इक एक हर्फ़ अज़बर था

बस एक याद थी जो ख़ुद-कुशी से रोकती थी
नज़र के सामने जब बे-कराँ समुंदर था

ये चाहता था कि छत सब के सर पे हो 'मंज़र'
मिरे पड़ोस में जो शख़्स आप बे-घर था