उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dhundla sa aks miTti hui si lakir tha

धुँदला सा 'अक्स मिटती हुई सी लकीर था

دھندلا سا عکس مٹتی ہوئی سی لکیر تھا

शायर: Raees Manzar7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

धुँदला सा 'अक्स मिटती हुई सी लकीर था
ये कौन था जो मेरी नज़र में असीर था

आया कुछ इस अदा से कि पलकें भिगो गया
झोंका तिरे ख़याल का कितना शरीर था

अब सोचता हूँ कैसे अदा होगा ख़ूँ-बहा
मुझ से जो क़त्ल हो गया मेरा ज़मीर था

घेरे हुए थे सब को पुर-असरार रास्ते
सहमा हुआ ख़ुद अपने से हर राहगीर था

मिलता था इक 'अजीब सी दूरी लिए हुए
वो भी मगर हिसार-ए-अना में असीर था

मुख़्लिस अगर नहीं था अदाकार ही सही
जो कुछ भी था वो मेरे लिए ना-गुज़ीर था

उर्दू को मानता था वो बोली 'अवाम की
'मंज़र' भी हम-ख़याल-ए-'कबीर'-ओ-'नज़ीर' था