उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jo purane Dhang ke the ghar wo sare Dhah gae

जो पुराने ढंग के थे घर वो सारे ढह गए

جو پرانے ڈھنگ کے تھے گھر وہ سارے ڈھ گئے

शायर: Raees Manzar7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जो पुराने ढंग के थे घर वो सारे ढह गए
हम नई तहज़ीब के साँचे में ढल कर रह गए

अब के वो सैलाब ने की है सितम-कारी यहाँ
इक पड़ोसी गाँव में तो झोंपड़े तक बह गए

कल भी उन की बात को सुन कर रहे ख़ामोश हम
जाहिलों के तब्सिरे को आज भी हम सह गए

तोड़ दीं इस बार ग़ुस्से ने हदें आदाब की
रू-ब-रू क्या कुछ अमीर-ए-शहर के हम कह गए

हो सके तो कुछ बता कुछ याद तो होगा तुझे
ऐ ज़मीं तुझ पर उतर कर चाँद कितने गह गए

देखते ही देखते दुनिया तो आगे बढ़ गई
और इक हम थे कि बस हो कर तुम्हारे रह गए

आ नहीं पाए कभी अल्फ़ाज़ की दहलीज़ तक
कुछ ख़याल ऐसे थे 'मंज़र' जो सरों में रह गए